Back to Vrat Kathas

Savitri Vrat Katha

storyvrat
सावित्री व्रत कथाभद्र देशक महाराज बडे धर्मात्मा प्रजा पालक अश्वपति छलाह, तनिका कोनो संतान नहीं छलेंह। से महाराज महारानी मालवीक अनुमति पाबी वन जाय परासर मुनिक उपदेश सौं गायात्रिक अनुष्ठान कैलेंह। गायत्री देवी सौं वर लाभ कई राजा राजधानी आएलाह, पश्चात हुनका एक कन्या जन्म लेलथींह। सावित्रिक अनुष्ठान सौं कन्याक जन्म भेलेंह तें ताहि कन्याक सावित्री नाम राखल गेलेंह।परमा सुंदरी सर्वगुण सम्पन्न से सावित्री राजकन्या बडे सुशीला छलीह। हुनका माँ महारानी मालवी बाल्यावस्था सौं लिखाय पाढाय उत्तम-उत्तर उपदेश ओ गृह परिचर्या आदि स्त्री धर्म सौं सुशिक्षित कय लोकक हेतु एक आदर्श बनाय देलथींह। बाल्यावस्था में बलिकाक मन में जे अभ्यास नीक अघ्लाह कराय देल जाय छेंह, से स्वाभाव हुनका जन्म भरिक हेतु उन्नति, अवनति, सुनाम, दुर्नाम, यश, अवयश देनिहार मे जाय छेंह।जखन विवाह योग्य भेलींह तखन हुनका माँ-बाप सुयोग्य वर निमित महाराज कुमार सबहिक बहुतो अन्वेषण कयलेंह, किन्तु सवित्रीक अनुरूप सौंदर्य ओ सर्वगुण सम्पन्न वर कतुहू नाही भेटलथींह। पश्चात हुनका माँ-बाप सावित्री याहि के अपन योग्य वर ताकि लेवाक आज्ञा देलथींह। जखन बहुत दूर चली गेलीह ताहि ठाम एक तापोवनक सन्निधी धुमुतसेन महाराज (जनिक राज हरण भै गेल छलेंह) तनिका कुटी छलेंह। ताहि कुटिक समीप ही हुनक पुत्र सत्यवान सौं भेंट भै गलेंह, सावित्री हुनक सौन्दर्यता पर मोहित भय हुन्काही पति स्वीकार कयलेंह।सावित्री अपना पिताक राजधानी में धुरी अयलीह आ पिता सौं सत्यवानक परिचय ओ विवाहक व्यवस्था कही सुनौलेंह। ताहि काल नारद मुनी सेहो राजाक सन्निधि में बैसल छलाह। सवित्रिक कथा सुन नारद देवर्षि अश्वपति के कहलथींह— "हे महाराज! सत्यवानक आयुष आए सौं पुरे एक वर्ष धरी छेंह, तादुत्तर लागले ओ ई देह त्याग कै परलोक प्राप्त करताह।" नारद मुनिक कथा सुनि महाराज अत्यंत व्याकुल भए कन्या के बुझाबह लगलाह। मुदा सावित्री कहलथींह— "हे पिता! हम अपना ह्रदय रुपी मंदिर में सत्यवानक मुर्तिक स्थापना काय चुकलहुँ। दीर्घायु हेयु या अल्पायु आब हमर स्वामी सत्यवान भेलाह।"महाराज अश्वपति अपन कन्या सावित्री के तपोवन लए जाय सत्यवान सौं विवाह कराय देलथींह। सावित्री अपन पिताक राजधानीक राजस्थ सुख सब के त्याग स्वामीक ओ वृद्ध ससुर और सासुक सेवाक हेतु घोर वन में रहय लगलीह। राज भवनक भोग्य मिष्ठान्न पदार्थक बदला में ताहू से अधिक सुखदायक कन्द मूल फल के अमृत बुझी संतोष पूर्वक स्वामीक सुश्रुषा में रही निर्वाह कराय लगलीह।यही प्रकारक सुख आनंद में पूर्ण एक वर्ष बीत गेल। सत्यवानक मृतुयक दिन पहुंच गेल। सावित्री चिन्ता स व्याकुल भए अन्न पानी त्यागि देलेंह। ओही दिन सत्यवान फल मूल लेवाक हेतु वन जय्वाह पर उदृत भेल्लाह, से देखी सावित्री ससुर ओ सास स आज्ञा लेय स्वामीक संग वन विदा भेलीह। जयेत जयेत जखन घोर वनक के बीच सत्यवान पहुंचाला, तखन एक वट वृच्छ तर हुनका माथ में तेहन असाध्य व्यथा उठ्लनहि जे ओ सावित्रीक कोरा में माथ राखी अचेत भए खसी परलाह।ताहि काल धर्मराज गदा ओ फाँस हाथ में लेने ओही ठाम पहुंच ही गेलाह आ सत्यवान क प्रान हरण कए दक्षिण दिशा कें विदा भेलाह। सावित्री स्वामी क दुर्दशा देखी धर्मराजक पाछा-पाछा चलि देलीह। यमराज हुनका घूरि जाय लेल कहलथींह, मुदा सावित्री अपन मधुर आ तर्कपूर्ण गप्प सौं यमराज के प्रसन्न कय लेलथींह। सावित्री कहलथींह— "हे धर्मराज! अपने जे हमरा ईश्वर भजन करै कहै छी से कथा अपनेक हम मानल, परंतु शास्त्र में सुनल अछि जे स्त्री के स्वामी सेह इश्वर थिकथीन्ह।"पति प्रेम में एकाग्र देखि यमराज प्रसन्न भेलाह आ वरदान मांगबाक लेल कहलथींह। सावित्री विचारी कै बजैत भेलीह— "हे धर्माधीश, जौं अपने हमारा पर प्रसन्न भेलाहुं तौं अनुग्रह पूर्वक एक गोट वर देल जाए— हमर ससुर राज सिंहासन पर बैसी अपना पौत्र सब के हमारा भाई सभक संग खेलाईत देखथी।" यमराज सावित्रीक बुद्धी ओ स्वामीभक्ती देख अतिशय प्रसन्न भै 'तथास्तु' कहलथींह आ सत्यवानक प्रान फांसी स खोलि अन्तर्हित भै गेलाह।सावित्री वट वृक्ष तर घूरि क चलि आयलीह, तँ सत्यवान जीवी कै उठि बैसलाह। एम्हर धुमुत्सेन महाराज के आँखि सौं सुझय लग्लेंह आ हुनक राज-पाट सेहो वापस भेट गेलेंह। सावित्री अपना पति व्रत धर्मक प्रसाद सौं दुहू कुल के समुज्ज्वल कयलेंह। जे स्त्री ज्येष्ठ कृष्ण अमावस्या में वट वृक्षक पूजन करै छथि, धर्मराजक प्रसाद सौं तनिक सौभाग्य ओ स्वामीक आयुष बढ़ै छन्हि.बरसाइत पावनिक कथा : नाग नागिन आ विद्वान ब्राह्मण“गौरी गणपति ध्यान करि, सिर वर पत्रक पाग |कथा सुनय जे प्रेम सँ, बाध्य भाग सोहागा ||”मिथिलाक कोनो गाम मे एकटा विद्वान ब्राह्मण छलाह । हुनक परिवार मे पत्नी, आ सात टा बालक छलनि | ब्राह्मण अपन विद्वता आ पुरोहितिक बलें सुख पूर्वक जीवन व्यतीत करैत छलाह । एक दिन ब्राह्मणी भानस करवा काल भात राखि माछ परोसबाक वर्तन केर अभाव मे चुल्हिक पाछु मे एकटा बिहरि मे माछ पसा देलनि । ओहि बिहरि मे एकटा नाग नागिन केर बास छल जकर सात गोट अंडा तप्त माछक प्रभाव सँ नष्ट भ' गेलैक । ओ नागिन कुपित भय प्रतिज्ञा कयलनि जे जहिना ई ब्राह्मणी हमर सात गोट भावी संतान के मारि देल अछि तहिना हम आ नाग मिलि एकरो सातो टा बेटा केँ शुभ दिन ताँकि ताँकि केँ डसि के मारि देब । ई निश्चय कए नाग नागिन ब्राह्मणक घरक आबास त्यागि गामक बाहर एक गोट बरग गाछक जड़िके बिहरि मे चलि गेल ।ब्राह्मणक प्रथम पुत्र जखन विवाहक बाद दुरागमन कए कनियाँ सहित गाम वापस अबैत छलाह तँ ओहि गाछक तर अबिते ब्राह्मणकुमार केँ नाग डसि लेलैक आ ओ ठामहि प्राण त्यागि देल । एवं प्रकारे एहne दुर्घटना ब्राह्मणक पांचों ओरे बेटाक संग विवाहक उपरांत घटित भेल । आब ब्राह्मण केँ मात्र एकटा कुमार पुत्र बचि गेलनि । ब्राह्मण सोचल जे हमर छठो पुत्रक मृत्यु विवाहक उपरांत भेल अछि तदर्थ एहि पुत्रक विवाह नहि करायब । ब्राह्मणक छोट पुत्रक विवाह लेल अनेक घटक आ कन्यागत आयलाह मुदा ब्राह्मण देवता अपन प्रतिज्ञा पर अटल रहलाह । एहसँ आबि ब्राह्मण केँ दरिद्रक अभिशाप सेहो व्याप्त भय गेल । घर मे साँझक साँझ उपास होमय लागल । ब्राह्मण अपने रोगी आ अकर्मण्य भऽ गेलाह । तदर्थ शिक्षा आ पुरोहिती कर्म सँ आय समाप्त भय गेल । ब्राह्मण कुमार पिताक पग चिन्ह पर चलबाक अथक प्रयास कएल मुदा ओ एहि कार्य मे जामि नहि सकलाह । एहना स्थिति मे ब्राह्मण पुत्र कतहु जाइ अर्थ कमाय माए बापक पोषण करबाक दृढ़ निश्चय कए गाम सँ कोनो नगरक हेतु प्रस्थान कएल ।नगरक यात्रा क्रम मे ओ एक गामक बाटे चलि, जाइत छलाह कि ओहि गामक एक झुंड कुमारी कन्या कोनो आन गामक प्रसिद्ध मंदिर मे पूजा करबाक निमित्त हिनक पाछु पाछु चलए लागलि । ब्राह्मण कुमार अपन जूता केँ हाथ मे लेने छलाह आ अत्यंत तीख रौद रहितहुँ अपन छाता केँ मोड़ि काँख तर दबने छलाह । हुनक एहन अटपटांग कार्य देखि कुमारी कन्याक झुंड सँ एकटा कन्या हँसैत अपन संगी सहेली सँ कहलि जे देखैत जाउ हे, दाय सभ आगू आगू जाइत एहि ब्राह्मण कुमारक तमाशा । तीख रौद रहितहुँ ई मूर्ख छाता केँ काँख मे दबने अछि आ जूता केँ पैर मे नहि पहिर हाथ मे टँगने अछि । सखी केँ व्यंग्य सुनि ओहि मे सँ एकटा सुदर्शना आ बुद्धिमती बाजलि - जे नहि हे, ई ब्राह्मण कुमार परम चतुर अछि । एकर बात साफ आ काँट कुश रहित अछि तदर्थ ई अपन जूताक व्यवहार नहि कए ओकर घसाएब आ टूटब सँ रक्षा कए रहल अछि आ छाता एहि तेल काँख तर दबने अछि जे एहि रौद मे चड़े- चनमुनि आदिक कोनो शंका नहि जे वस्त्रादि वा देह पर बीट कए अपवित्र कए देत । कनेक काल बाद एकटा नाला आयल तँ ब्राह्मण पुत्र चट जूता पहिर नाला मे प्रवेश कए गेलाह से देखि पूर्वक सखी फेर हँसि कहल जे तँ एकरा बुद्धियार कहलह ? मुदा ई तँ जूता केँ पेन मे पहिर नहि करबाक पर तुलल अछि । ताहि पर दोसर सखी बाजलि नहि हे, बहिन ! एहि कार्य मे एकर बुद्धियारी अछि जूता शारीरिक रक्षा हेतु अछि । कहीं जलक नीचाँ केर कंकर पाथर आदि पैर मे गरए नहि तैं ई जूता पहिरल अछि ।किछु कालक उपरान्त ब्राह्मण कुमार एकटा वृक्षक छाया मे सुस्तेबाक हेतु बैसलाह तँ छाया मेअपन छाता तानि लेल से हुनका उनटा व्यापार देखि प्रथम कुमारी फेर हँसि देलक तँ ओकर सुदर्शना सखी कहलि जे देखह सखी ,एहि गाछक शाखा पर अनेक चिड़ै चुनमुन्नी सभ बैसल अछि जे अचानक बीट कऽ वस्त्र आ देह ने घिनाए दिएअ तदर्थ ई छाता ततने छथि। ब्राह्मण कुमार एहि सुदर्शना आ परम चतुरा कन्याक सभ बात सुनैत छलाह आ हिनक बुद्धि आ रूप सँ मोहित भए हिनका सँ विवाह करबाक निश्चय कऽ हिनक पिता सँ अपन परिचय दैत कन्या सँ विवाह करबाक प्रस्ताव राखल। कन्याक पिता प्रस्ताव सहर्ष स्वीकार कए अपन कन्याक विवाह हिनका सँ कराए देल।विवाहक पाँचमे दिन कन्या कैँ वरक संग बहुत रास धन आ जैतुक संग विदा कए देल। ब्राह्मण कुमारक गाम ओहि ठाम सँ three दिनक रास्ता छल आ ओही दिन वत सावित्री पर्व सेहो छल तदर्थ ओ कन्या अपन माए सँ कहि बरिसाइट पूजाक सभ सामिग्री सेहो लय लेलनि जे बाटहि मे कोनो गाछ तर बैसि पावनि कए लेब। संयोग एहन जे ओ लोकनि अबैत अबैत ओही वृक्षक निकट पावनि करबालय रुकलीह जतय नाग नागिन केर निवास छल। नाग नागिन ब्राह्मण कुमार आ हुनक पत्नी कैँ देखि प्रसन्न भय उठल जे जे हमरा सभक प्रतिज्ञाक पूर्ति अनायासे भऽ गेल। एम्हर ब्राह्मण कुमारक नवौढा पत्नी ओहि गाछ तर पूजा करबाक निमित्त सामिग्री सभ पसाराए लगलीह तँ चट दय नाग अत्यंत लघु रूप धारण कए पूजाक सामिग्री मे सँ खिरोधिनी मे प्रवेश कए गेल जे अवसर एने कुमार केँ डसि लेब। नागक ई कार्य कुमारक पत्नी देखि रहल छलीह। शीघ्रता सँ ओ खिरोधिनी जे जे माँटिक लोटा आकारक पात्र होइत अछि तकरा एकटा सरवा सँ झाँपि अपन जांघ तर मे दावि पूजा करए लगलीह। एहि प्रकारैँ नागक प्राण संकट मे देखि नागिन भयातुर भए ब्राह्मणी सँ हाथ जोड़ि कातर स्वर मे अपन वर माँगल। नागिन केर आतुरता निरखि ओ कन्या बा़जलि - "जे तौँ हमर मर दे आ अपन वर ले।" तखन ओ नागिन ब्राह्मणक मुइल छओ भाय केँ जीवित कए देलक। तखन ओ कन्या सेहो नाग केँ छोड़ि देल आ सातो भाय एक संगे घर विदा भेलाह। ब्राह्मण कुमार सातो भाय घर पहुँचलाह आ हुनक माए सभ केँ परिछि हुलसि कए घर आनल।सामग्री एवं विधिसामाग्री – 1. बियन-8 टा 2. डाली -8 टा 3. बोहनी-1 4. अहिवात 5. उड़द दाल के बड़-14 6. सुतरी 7. सरवा -२ 8. मइँटक नाग-नगीन 9. केरा क पात 10. लावा 11. एकटा सरवा में दही 12. मुंग (फुलायल नवेद्यक वास्ते ) 13. चना फुलायल 14. लाल कपड़ा 15. कनिया -पुतरा 16. साजी 17 . चावल (अरवा चौर ) 18. जनऊँ -एक जोड़ आ गोटा सुपारी 19. फल ,फूल ,मिठाई 20. कांच हरिद (हल्दी), दुईब, गोटा धनिया 21 बिन्नी (ललका कपड़ा में चौर, दुईब , हरिद बांधल) 22 .दूधविधि:एक दिन पहिने कनिया नहा धोय कय अरवा भोजन करथिन.साँझ खन भगवती ,महादेव ,ब्राह्मण ,हनुमान और गौरी कय गीत गावि, दुईब ,कांच हल्दी ,धनिया (कनी )मिला क गौर बनत, जकरा ढउरल सरवा पर एकटा सिक्का पर गौरी राखि पान क पात स झापि ,पान क पात क ऊपर सिंदूरक गद्दी राखि ललका कपड़ा स झापि भगवती लग राखि देवेइ ।उड़द दालि के फुला के १४ टा बड़ पकैल जायत ,जकरा सरेला पर सुतरी में गांथल जायत (बिना सुइया के) बड़ गुथल सुतरी के बोहनी के मुँह पर बांधल जायत ।केरा के पात पर सिन्दूर आ काजर सँ बिष-विषहारा लिखल जायत ।राति खन कनी मुंग आ बेसी बंट (कला चना ) फुलय ल पड़तय ।वट सावित्री पूजा क दिननव कनियाँ नहा धो क सासुर स आयल नव कपड़ा पहिर के श्रृंगार कय ,खौछ लय ,भगवती क पूजा कय ,हाथ में साजी (जाही में कनिया पुतरा रहत ), आ माथ पर बोहनी (जाही में लाबा भरल रहत आ जकरा मुँह पर सुतरी में बांधल 14 टा बड़ रहत )लय के भगवती के गोड लागी सब संगे बड़ क गाछ तर जेतीगाछ तर बोहनी में राखल लाबा कर के पात पर राखि देथिन आ ओही बोहनी में पानि भर देथिनगाछ तर अरिपन रहत ,एकटा अरिपन के ऊपर 7 टा बिअनि रहत ,आ सात टा डाली में फुलायल बंट ,फल ,मिठाई राखल रहतगाछ तर अहिवात जरायल जैतएक टा डाली में चौर ,सुपारी जनऊ, पैसा फल -मिठाई राखल रहत जे पूजा के बाद पंडित क य देल जायतआम क पात पर 60 (साइठ ) ठाम फुलायल मुंग आ फल -मिठाई के नवेद्य लगायल जायतएकटा बिअनि पर आ एक टा आम पर पांच टा सिन्दूर लगा बड़ के गाछ के जैड़ में राखल जैतअरिपन पर विष-विषहारा लिखल पात राखि ओही पर मइँटक विष -विषहारा राखल जायतकनिया एक टा बड़ क पात केश में खोसतीसबटा ओरिआन बाद कनियाँ गौरी सबहक (सासूर बला, नहिअर बला जे राति में बनल आ विवाह बला ) आगु नवेद्य राखि फूल आ सिन्दूर लय गौरी पूजतिओकरा बाद बिन्नी हाथ में लय जांघ तर बोहनी राखि कथा सुनति (कथा ब्लॉग में नीचां उपलब्ध भेटत )कथा सुनला के बाद कनिया साडी के खूंट पर गाछ तर रखलाहा आम आ एक टा सिन्दूर क गद्दी ल के मौली धागा बांधैत गाछ के चारु तरफ पांच बेर घूमतीफेरे गाछ तर राखल बिअनि से गाछ के तीन बेर हॉकैत गला मिलतिअब पुतरा के हाँथों कनिया के सिंदूरदान हेतई (कनिये करेती)ओकरा बाद सबटा नवेद्य उसगरति ,आ विष-विषहारा के दूध लाबा चढ़ेतिबोहनी में बांधल सबटा बड़ के वायां हाथ के अंगुठा और अनामिका स तोरी के एक बेर आगु आ एक बेर पाछु फेकैत फकरा पढती - बड़ लिय (पाछु ), मर दिय (आगु )ओकरा बाद माथ पर फेर बोहनी उठावैती ,हाथ में साजी लेती आ भगवती घर में एतीगाछ तर राखल डाली सेहो उठी के भगवती घर में रखायतभगवती के गोड़ लागी 7 टा अहिवाती के डाली देथिन आ सब पैघ सब के गोड़ लागी आशीर्वाद लेती

"Sachchidananda Bhagwan ke pranam kay..."

Meaning

Comprehensive Savitri Vrat guide: The stories of Savitri-Satyavan and Naga-Nagin, including full ritual procedure (Vidhi) and materials (Samagri).